नए जिलों के गठन की मांग को पूरा नहीं कर पाई सरकार

1 min read

देहरादून। उत्तराखंड में नए जिलों के गठन की मांग पिछले लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सरकार इस मांग को पूरा नहीं कर पाई है। हर विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में राजनीतिक दल नए जिलों के गठन का वायदा करते हैं, लेकिन सत्ता में आने पर वे इसे भूल जाते हैं। 25 वर्षों में राज्य में एक भी नए जिले का गठन नहीं हो पाया है।
नए जिलों के गठन की मांग के पीछे की मुख्य वजह ये है कि प्रदेश के 10 पर्वतीय जिलों में विकास और मूल भूत जरूरतों की अलग-अलग मांग रही है। इसे देखते हुए राज्य गठन के दौरान ही छोटी-छोटी इकाइयां बनाने की मांग की गई, जिससे न सिर्फ प्रशासनिक ढांचा जन-जन तक पहुंच सके, बल्कि प्रदेश के विकास की अवधारणा के सपने को भी साकार किया जा सके। दरअसल, सूबे में कोटद्वार समेत रानीखेत, प्रतापनगर, नरेंद्रनगर, चकराता, डीडीहाट, खटीमा, रुड़की और पुरोला ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें जिला बनाए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सामाजिक संगठनों के साथ ही राजनीतिक दलों ने भी इस आवाज को समय-समय पर बुलंद किया है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने प्रदेश में चार नए जिले बनाने की घोषणा की थी।
उन्होंने गढ़वाल मंडल में 2 जिले (कोटद्वार, यमुनोत्री) और कुमाऊं मंडल में 2 जिले (रानीखेत, डीडीहाट) बनाने की बात कही थी। चुनावी साल में हुई इस घोषणा का शासनादेश भी जारी कर दिया गया था, लेकिन गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ।
निशंक के पद से हटते ही यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इतना ही नहीं इसके बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार आने के बाद तत्कालीन विजय बहुगुणा की सरकार ने इस मामले को राजस्व परिषद की अध्यक्षता में नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन संबंधी आयोग के हवाले कर दिया, लेकिन साल 2016 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री बदलने के बाद हरीश रावत सत्ता पर काबिज हुए और उन्होंने एक बार फिर 8 नए जिले बनाने की कवायद शुरू कर एक सियासी दांव खेला। साथ ही नए 8 जिलों (डीडीहाट, रानीखेत, रामनगर, काशीपुर, कोटद्वार, यमुनोत्री, रुड़की, ऋषिकेश) को बनाने का खाका भी तैयार कर लिया था, लेकिन कुछ नहीं हो पाया।
उसके बाद से अभी तक नए जिले बनाए जाने की चर्चाएं हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं। इस बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी बीच में राज्य में नए जिले बनाए जाने की बात की थी, लेकिन वे इस दिशा में कुछ भी नहीं कर पाए। अपने चार वर्ष के इस कार्यकाल में धामी सरकार नए जिलों के गठन के मामले में एक कदम भी आग नहीं बढ़ी। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस प्रदेश के नए जिलों के गठन का मामला हर बार सियासत की भेंट चढ़ता रहा है। सूबे में विधानसभा चुनावों के दौरान नए जिलों के गठन का वादा किया जाता रहा है। न केवल बीजेपी और कांग्रेस की तरफ से नए जिलों के गठन के वादे किए जाते रहे हैं, बल्कि 2022 के विधानसभा चुनाव में तो पहली बार चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने भी राज्य में 6 नए जिलों के गठन का सपना दिखाया था। उन्होंने काशीपुर को जिला बनाने के लिए सार्वजनिक घोषणा की थी तो वहीं उनकी इच्छा यमुनोत्री, कोटद्वार, रुड़की, डीडीहाट और रानीखेत को भी जिला बनाने की थी, लेकिन आम आदमी पार्टी इस चुनाव में मटियामेट हो गई और नए जिले की बात भी गायब हो गई।
उत्तराखंड राज्य स्थापना से पहले से ही प्रदेश के कुछ जिले ऐसे रहे, जिनका क्षेत्रफल बेहद ज्यादा था। इसी वजह से दूरदराज और जिला मुख्यालयों से कटे होने की वजह से कई क्षेत्रों में नए जिलों के पुनर्गठन की मांग उठी थी। इसमें खासतौर पर चमोली जिला रहा, जिसका क्षेत्रफल काफी बड़ा था। इस जिले में जिन क्षेत्रों में नए जिलों की मांग उठी, इसमें थराली, गैरसैंण और कर्णप्रयाग क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा हरिद्वार जिले में भी रुड़की के लिए मांग उठाई गई। उधर, उत्तरकाशी में यमुनोत्री, पिथौरागढ़ में डीडीहाट और पौड़ी जिले में कोटद्वार समेत उधम सिंह नगर में काशीपुर को जिला बनाए जाने की मांग उठती रही है।

Copyright, Mussoorie Times©2023, Design & Develop by Manish Naithani 9084358715. All rights reserved. | Newsphere by AF themes.