राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को “फल पट्टी” के रूप में विकसित करने की तैयारी
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देहरादून। उत्तराखंड को “फल पट्टी” के रूप में विकसित करने की तैयारी है। राज्य के उच्च हिमालयी एवं मध्य पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु, मिट्टी एवं भौगोलिक परिस्थितियां फलोत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इन प्राकृतिक विशेषताओं के अनुरूप फल प्रजातियों एवं उच्च उत्पादकता वाली किस्मों का चयन कर, क्लस्टर आधारित एवं तकनीक समर्थित मॉडल अपनाये जाने की जरूरत है। प्रदेश में कीवी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए न्यूजीलैंड से आई विशेषज्ञ टीमों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर तकनीकी सुझाव व सहायता दी जा रही हैं। वहीं, एप्पल मिशन एवं अति सघन बागवानी योजना के अंतर्गत उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उन्नत किस्मों, पौध गुणवत्ता उन्नयन एवं बाजार-उन्मुख उत्पादन पर ध्यान दिया जा रहा है। कीवी के अलावा ड्रैगन फ्रूट उत्पादन की भी राज्य में अच्छी संभावनाएं हैं, इस दिशा में भी प्रयास शुरु कर दिए गए हैं।
फलोत्पादन की दृष्टि से उत्तराखंड अब कीवी और ड्रैगन फ्रूट की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने जा रहा है। वर्तमान में राज्य में 682.66 हेक्टेयर में कीवी की खेती हो रही है, जिससे 381.80 मीट्रिक टन उत्पादन हो रहा है। सब्सिडी योजना के तहत प्रति एकड़ 12 लाख की लागत पर 70 प्रतिशत तक सहायता मिल रही है, बाकी 30 प्रतिशत राशि किसान द्वारा लगाई जा रही है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती राज्य के उन क्षेत्रों के लिए मुफीद है, जहां पानी की कमी है या वन्यजीवों का आतंक अधिक है। ड्रैगन फ्रूट योजना के तहत उद्यान स्थापना के लिए आठ लाख प्रति एकड़ का 80 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। शेष 20 प्रतिशत किसान स्वयं वहन करेगा। यह कम मेहनत में अधिक मुनाफा देने वाली फल की फसल है। देहरादून, टिहरी, पौड़ी, नैनीताल, बागेश्वर, हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिलों में इस फल की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्य में वर्तमान में 35 एकड़ क्षेत्र में 70 मीट्रिक टन ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हो रहा है।
राज्य के रामगढ़, मुक्तेश्वर, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसी फल पट्टियों में किसानों के लिए कीवी आशा की नई किरण बन चुकी है। यहां एक हेक्टेयर में कीवी की खेती करने वाला किसान सालाना 22 से 28 लाख रुपये तक कमा रहा है। नई कीवी बागवानी नीति ने इस बदलाव को और भी तेज गति दी है। राज्य सरकार की ओर से किसानों को 70 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है।जिससे नई पौध और ढांचा तैयार करने में बड़ी मदद मिल रही है। यही वजह है कि जो किसान पहले सेब, आड़ू और माल्टे पर निर्भर रहा करते थे, वे अब कीवी की खेती की ओर रुख कर रहे हैं।
उत्तराखंड में कई दशकों से कुमाऊं और गढ़वाल के ऊंचे इलाकों में सेब की बागवानी होती आ रही है। लेकिन शोध, नई प्रजातियों और संसाधनों के अभाव में उत्तराखंड का सेब हिमाचल की टक्कर नहीं ले पाया। हिमाचल ने सेब की उन्नत नस्लें विकसित कीं और विपणन तंत्र मजबूत किया, जबकि उत्तराखंड उस स्तर तक नहीं पहुंच सका। लेकिन अब यहां एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। अब कीवी किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन रही है। इसकी खेती में कम जोखिम है, खाद और कीटनाशक की जरूरत भी बहुत कम होती है। सबसे अहम बात यह है कि कीवी को बंदर या अन्य जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते क्योंकि फल में महीन रोएं होते हैं, जिससे किसान बागों की सुरक्षा को लेकर निश्चिंत रहते हैं। पहाड़ों का ठंडे मौसम और ऊंचाई वाले इलाके कीवी के लिए बेहद उपयुक्त माने जा रहे हैं। मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि न्यूनतम 10 क्लस्टरों का चरणबद्ध विकास किया जाए। ड्रैगन फ्रूट, कीवी एवं सेब उत्पादन में कम- से-कम 30 प्रोग्रेसिव किसानों को तैयार किया जाए। उच्च उत्पादकता वाली वैरायटी का चयन कर वैज्ञानिक तकनीक आधारित प्रशिक्षण दिया जाए। योजनाओं में औपचारिकता के स्थान पर धरातल पर स्पष्ट परिणाम सुनिश्चित किए जाएं। किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, फील्ड डेमो एवं संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराया जाए।
