प्रदेश के कई इलाकों में जंगल वनाग्नि की चपेट में, अमूल्य वन संपदा को हो रहा नुकसान
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देहरादून। गर्मी बढ़ते ही उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में जंगल आग से धधक रहे हैं। आग लगने से अमूल्य वन संपदा जलकर खाक हो रही है, वन्य जीवों का जीवन भी संकट में पड़ गया है। वायुमंडल और इंसानों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। जंगलों की लगी आग का धुआं नगरों तक फैल चुका है, जिस कारण वायु प्रदूषण बढ़ गया है। वनों की आग तेजी से आबादी क्षेत्रों की ओर बढ़ रही है, जिससे आसपास के लोगों में दहशत देखने को मिल रही है। अस्कोट का कस्तूरी मृग अभयारण्य भी वनाग्नि की चपेट में है, जिससे वन्यजीव संसार के जीवन पर भी संकट गहराने लगा है।
टिहरी, पौड़ी, रूद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर आदि जिलों में अधिकांश जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं। चमोली जिले में केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के अंतर्गत नागनाथ रेंज की खाल, रौता बीट और कैलव बीट के चीड़ के जंगलों में भीषण आग लगी है। तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैल रही है, जिससे बड़े पैमाने पर वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है। दुर्गम क्षेत्र और सूखे चीड़ के जंगलों के कारण आग बुझाने में वन कर्मियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
ऋषिकेश क्षेत्र में भृगुखाल रेंज में पिछले पांच दिनों से लगी भीषण आग ने वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाया है। आग की चपेट में आकर करीब 50 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो गया है, जिसमें सबसे अधिक क्षति साल के घने जंगलों को हुई है। लगातार फैल रही इस आग से वन्य जीवों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है। न्याय पंचायत बड़यूंन के अंतर्गत आने वाले ग्वाड़ी, लमखेत, निशनी, तुन्ना, बड़यूंन और नालीखाल क्षेत्रों में आग लगातार धधक रही है। वनाग्नि के कारण न केवल बहुमूल्य वन संपदा नष्ट हो रही है, बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता पर भी गहरा असर पड़ रहा है। वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने से उनके पलायन और जान-माल के नुकसान की आशंका बढ़ गई है।
पिथौरागढ़ में बेरीनाग, गंगोलीहाट, गणाई, थल, डीडीहाट, मुनस्यारी, धारचूला के जंगलों में आग लगी हुई है। बागेश्वर जनपद के धरमघर, कपकोट, कांडा और गरुड़ क्षेत्र के जंगल इन दिनों भीषण आग की चपेट में हैं। आग लगने से अमूल्य वन संपदा जलकर खाक हो रही है। अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य पिछले 14 दिनों से जल रहा है। अभयारण्य में भीषण आग लगने से क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ कस्तूरी मृग के जीवन पर खतरा मंडरा गया है। अभयारण्य से लगातार धुआं उठ रहा है। वनाग्नि ने अभयारण्य के बड़े दायरे को अपनी चपेट में लिया है। हजारों हेक्टेयर में फैले इस जंगल में कस्तूरी मृग के अलावा भालू, तेंदुआ, हिरन आदि दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी है। वनाग्नि से इन वन्यजीवों के जीवन पर भी संकट आ गया है, वहीं बहुमूल्य वन संपदा को भी आग से खासा नुकसान पहुंच रहा है।
पिछले पांच दिनों में प्रदेश में 41.27 हेक्टेयर जंगल जल गए हैं। इस अवधि में कुमाऊं में 9.6 हेक्टेयर और गढ़वाल में 29.37 हेक्टेयर जंगल को नुकसान पहुंचा है। पारंपरिक रूप से 15 फरवरी से फायर सीजन मनाने वाले वन विभाग के लिए अप्रैल के तीसरे सप्ताह से असल वनाग्नि सत्र शुरू हुआ है। जंगल की आग वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रही है। विभाग ने पिछले वर्षों में आग की घटनाओं से सबक नहीं लिया। न तो वन कर्मियों के पास आग बुझाने के पर्याप्त संसाधन हैं और न सुरक्षा के इंतजाम। पूर्व में गांव-गांव में फायर फाइटर तैयार करने का दावा भी किया गया था, मगर यह दावा धरातल पर नहीं दिखा है। लगातार पड़ रही धूप से जंगल की घास, चीड़ की पत्तियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। यही नहीं जंगल की नमी भी कम हो गई है। इस वजह से आग का खतरा काफी बढ़ गया है और यह दिख भी रहा है।
