सद्भाव और आस्था का प्रतीक देहरादून का प्रसिद्ध झंडा मेला

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देहरादून। देहरादून का ऐतिहासिक झंडा मेला एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक महोत्सव है। यह 349 से अधिक वर्षों से श्री गुरु राम राय जी के जन्मदिन और दून आगमन के उपलक्ष्य में सद्भाव, भाईचारा, मानवता और आस्था के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह मेला सभी धर्मों, समुदायों और वर्ग के लोगों को एक सूत्र में पिरोता है। होली के 5वें दिन शुरु होने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में देश और विदेश से संगतें पहुंचती हैं। सिखों के सातवें गुरु हरराय महाराज के बड़े पुत्र गुरु रामराय महाराज ने वर्ष 1675 में चैत्र मास कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन देहरादून में पदार्पण किया था। इसके ठीक एक वर्ष बाद 1676 में इसी दिन उनके सम्मान में उत्सव मनाया जाने लगा और यहीं से झंडेजी मेले की शुरूआत हुई। यह मेला दूनघाटी का वार्षिक समारोह बन गया।
तब देहरादून छोटा-सा गांव हुआ करता था। यहां मेले में देशभर से श्रद्धालु पहुंचते थे, और इतने लोगों के लिए भोजन का इंतजाम करना आसान नहीं था। तब श्री गुरु रामराय महाराज ने दरबार में सांझा चूल्हे की स्थापना की। उन्‍होंने ऐसा इसलिए किया ताकी दरबार साहिब में कदम रखने वाला कोई भी व्यक्ति भूखा न लौटे। पंजाब में जन्मे गुरु रामराय महाराज में बचपन से ही अलौकिक शक्तियां थीं। उन्होंने कम उम्र में ही असीम ज्ञान अर्जित कर लिया था। उन्हें मुगल बादशाह औरंगजेब ने हिंदू पीर यानी महाराज की उपाधि दी थी। गुरु रामराय महाराज ने छोटी उम्र में वैराग्य धारण किया और संगतों के साथ भ्रमण पर निकल पड़े। भ्रमण के समय ही वह देहरादून पहुंचे। बताते हैं कि यहां खुड़बुड़ा के पास गुरु रामराय महाराज के घोड़े का पैर जमीन में धंस गया। तब उन्होंने संगत को यहीं पर रुकने का आदेश दिया। उस समय औरंगजेब ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह को गुरु रामराय महाराज का ख्याल रखने का आदेश दिया था।
तब गुरु रामराय महाराज ने चारों दिशाओं में तीर चलाए और जहां तक तीर गए, उतनी जमीन पर अपनी संगत को ठहरने का हुक्म दे दिया। गुरु रामराय महाराज के यहां डेरा डालाने के कारण इसे डेरादून कहा जाने लगा, जो बाद में डेरादून से देहरादून हो गया। धीरे-धीरे झंडेजी की ख्याति दुनियाभर में फैलने लगी। हर दिन झंडेजी के दर्शनों को भीड़ पहुंचने लगी और श्रद्धालुओं के खाने की व्‍यवस्‍था के लिए दरबार साहिब के आंगन में सांझा चूल्हा चलाया गया। आज भी यहां हर दिन हजारों लोग एक ही छत के नीचे भोजन ग्रहण करते हैं।
गुरु राम राय दरबार इस्लामी और हिंदू वास्तुकला का एक उदाहरण है। यह गुंबद, मीनार और भित्तिचित्रों की एक मिश्रित संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शता है। गुरु राम राय दरबार में सिखों की पवित्र पुस्तकें आदि ग्रंथ साहिब हैं और इसमें एक बड़ा डाइनिंग हॉल भी है, जहां मुफ्त भोजन समुदाय के रसोई घर में पकाया जाता है और सभी आगंतुकों को निःशुल्क दिया जाता है। यहां की दीवारें फूलों और रूपांकनों से सजी हुई हैं, दरबार साहिब के निकट में एक तालाब है जहां भक्त स्नान करते हैं। झंडा मेला करीब 15 दिन चलता है। झंडा मेले की शुरुआत महंत की अगुवाई में विशाल जुलूस निकालकर की जाती है। दून घाटी में मनाया जाने वाला यह सबसे बड़ा मेला है। इस दिन झंडा चौक पर उत्‍सव का आयोजन किया जाता है और झंडा फहराया जाता है। दरबार साहिब सामाजिक समरसता, परस्पर प्रेम और भाईचारे की अपनी सैकड़ों वर्ष पुरानी गौरवशाली परम्परा के साथ देश और दुनिया में एक विशेष पहचान रखता है। यहाँ मु़गल शैली के लाहौर में स्थित जहाँगीर के मकबरे के प्रतिरूप की गुरु की समाधि है। कहा जाता है कि इसे औरंगजेब के आदेश से बनाया गया है। कहा जाता है की कि इसी डेरे के नाम पर देहरादून शहर का नाम रखा गया।

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